नदी से बेवफाई किसने की?

उत्तर भारत में बह रहा है पानी अपने आक्रोश भरे रूप में,क्या पहाड़ों ने प्रेम में बेवफाई कर दी है और नदी गुस्से में आकर कहीं दूर जा रही है..
उमड़ रहा है ये गुस्से का बवंडर लोगों के घरों तक,
सब जगह सिर्फ पानी का बहाव फैला है,
बह गए हैं कई घर,
बाकी बचे डरे सहमे सिर्फ झांक रहे है टेलीविजन की खबरों में...
पर समझ नहीं पा रहे हैं कौन है जिम्मेदार,
कौन संघर्ष कर रहा है,कौन संघर्ष करवा रहा है...
कब तक चलेगा ये रौद्र रूप.. 
क्या कैलाश के न्यायालय में न्याय नहीं हुआ?
कारखानों की खनक बाकी भारत में चल रही है,
वो तो जिम्मेदार नहीं हो सकती,
उनके मुख्य कर्मचारी तो ए.सी. के कमरों के अलावा कहीं नहीं जाते,
और जाते हैं तो अपनी गाड़ियों से सिर्फ घर...
ऐश ओ आराम की जिंदगी में,
किसे वक्त है पहाड़ और नदी से प्रेम करने का...
छुट्टियों के कुछ पल जरूर पहाड़ पर बैठ कर मैग्गी खाने में निकलते है,
हां कुछ दोस्त लोग वहां शराब भी पी आते हैं,
कौन देखता है ऊंचाई में नशा करते...
खैर,कोई देखे भी तो क्या फर्क पड़ता है,
वहां पीने के बाद बॉटल फोड़ने का मजा ही तो उन्हें नहीं पता...
बेचारे पहाड़ कांचों के चुभने से लथपथ हैं दुख से,
कहां है उन्हें नदी से बेवफाई करने का वक्त?
और फिर आते आते हम वहां मैग्गी के पैकेट फेंक आते हैं,
जो अटके रहते हैं जीवन भर किसी पत्थर के पास...
पिछली साल फेंके गए अपने अन्य साथियों के संग...
जरूरी भी क्यों है पहाड़ों का साफ होना,
आखिर हमें तो जाकर कच्ची मिट्टी के पक्की ईंटों वाले अपने घर में ही रहना है...
कभी कभी कुछ कर्मचारी जरूर वहां आते हैं,
सफाई अभियान चलाने,
फिर कुछ योजनाएं लाई जाती हैं पहाड़ी इलाकों के विकास के लिए...
घर घर नेटवर्क के लिए टॉवर लगा दिए गए...
हम अब बांध बनायेंगे,पूल बनायेंगे...
टूरिज्म को बढ़ावा देने के लिए होटल बनायेंगे...
पहाड़ काट दिए गए पूल बनाने के लिए,
पेड़ काट दिए गए रहने की जगह बनाने के लिए,
सड़क बनाने के लिए तोड़े गए अनेक पत्थर,
इंसान ने ये अनेक पत्थर तोड़े,
बदले में अब नदी पूल तोड़ रही है...
नदी भी जगह बना रही है ठहरने की...
समंदर में मिलने से पहले बवंडर से मिल रही है...
क्या नदी भी बेवफाई कर रही है?
धुआं फैला है,बोनफायर दावानल में बदल गई क्या?
वो जो कह रहे थे पहाड़ पर बॉटल फोड़ने का मजा ही कुछ और है,
वो बेचारे बेबस हैं,देख रहे हैं अपने साथियों को बहते,कहराते,बिलखते...
मगर आंसू भी नहीं दिख रहे,बाढ़ के पानी के आगे...
अब तो नदी प्रचंड रूप लिए हुए है,
सब मंदिरों के दरवाजे वहां बंद हैं मानो भगवान भी रूठ गया हो नदी के इस फैसले से...
शायद! झूठा हो पहाड़ की बेवफाई का इल्जाम।।
शायद! बेवफाई इंसान कर रहा हो।।
अभी बेवफाई का पता नहीं चला है
और मेरे मन के विचार भी अभी आधे ही यहां उतर पाए हैं,
वक्त की कमी को देखते हुए,
कलम को शांत किया जाए 
और प्रार्थना कर नदी को भी।।
~आदित्याChoudhary 
Note:- images from Google.

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